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समरस समाज से ही राष्ट्र का उत्थान : श्री रामदत्त चक्रधर

इस अवसर पर श्री रामदत्त चक्रधर ने कहा कि भारत का समाज और उसका इतिहास अत्यंत प्राचीन है। जो समाज जितना प्राचीन होता है, वह उतने ही उतार-चढ़ाव से गुजरता है। जब समाज एकरस और समरस होता है, तभी वह उन्नति के पथ पर अग्रसर होता है। उन्होंने मानव शरीर का उदाहरण देते हुए कहा कि शरीर के सभी अंगों के कार्य भले ही अलग-अलग हों, परंतु उनके भीतर एक ही चेतना और रस होता है।

उन्होंने कहा कि हमारे किसी भी ग्रंथ में विषमता या शोषण का समर्थन नहीं मिलता। आदरणीय डॉ. बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर भी यही कहते हैं। भारतीय समाज में जो विकृतियां आईं, उसका प्रमुख कारण अपने स्वत्व और मूल राष्ट्रीय चरित्र को भूल जाना रहा। इस्लामिक एवं अंग्रेजी शासनकाल में समाज को विभाजित करने के प्रयास हुए, किंतु इसके बावजूद लोगों ने अपनी संस्कृति और धर्म को नहीं छोड़ा।

श्री चक्रधर ने कहा कि संत पूज्य रैदास, वीर सावरकर, पंडित मदन मोहन मालवीय सहित अनेक समाज सुधारकों और राष्ट्रभक्तों ने सामाजिक समरसता के लिए निरंतर प्रयास किए। छत्तीसगढ़ के संत पूज्य बाबा गुरु घासीदास का “मनखे-मनखे एक समान” का संदेश आज न केवल देश बल्कि पूरे विश्व के लिए मार्गदर्शक है।

उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं का उल्लेख करते हुए बताया कि वर्धा शिविर में महात्मा गांधी के संघ शाखा भ्रमण के दौरान स्वयंसेवकों ने जाति का परिचय नहीं दिया, जिससे वे आश्चर्यचकित हुए और शाखा कार्यपद्धति की सराहना की। इसी प्रकार डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भी संघ शाखाओं में देखी गई सामाजिक समरसता की भावना की प्रशंसा की थी। कार्यक्रम में प्रांत प्रचारक श्री अभय राम, प्रांत प्रचार प्रमुख श्री संजय तिवारी, रायपुर महानगर संघचालक श्री महेश बिड़ला, सह प्रांत प्रचार प्रमुख श्री नीरज सहित बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।